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- Category: मार्च 2012
संदीप सिक्का, सीईओ, रिलायंस कैपिटल एएमसी :
कारोबारी साल 2011-12 की तीसरी तिमाही में विकास दर (जीडीपी) के जो आँकड़े आये हैं, वे निश्चित रूप से अनुमानों से कम हैं। घरेलू अर्थव्यवस्था अभी जिन दबावों का सामना कर रही है, उनमें महँगाई, ऊँची ब्याज दरों, निवेश में कमी, सरकारी घोटालों के सिलसिले, बाजार को पसंद आने वाले सुधारों पर सरकार की धीमी गति और विश्व अर्थव्यवस्था में कमजोरी के कारण लोगों के कम भरोसे को खास तौर पर गिना जा सकता है।
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संदीप सिक्का, सीईओ, रिलायंस कैपिटल एएमसी :
कारोबारी साल 2011-12 की तीसरी तिमाही में विकास दर (जीडीपी) के जो आँकड़े आये हैं, वे निश्चित रूप से अनुमानों से कम हैं। घरेलू अर्थव्यवस्था अभी जिन दबावों का सामना कर रही है, उनमें महँगाई, ऊँची ब्याज दरों, निवेश में कमी, सरकारी घोटालों के सिलसिले, बाजार को पसंद आने वाले सुधारों पर सरकार की धीमी गति और विश्व अर्थव्यवस्था में कमजोरी के कारण लोगों के कम भरोसे को खास तौर पर गिना जा सकता है।
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सचिन जैन, शीतल अशार, आईसीआईसीआई सिक्योरिटज :
इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ईएलएसएस) म्यूचुअल फंडों की ऐसी योजनाएँ हैं, जिनमें निवेश करके आप इक्विटी यानी शेयरों में निवेश से मिल सकने वाले अच्छे फायदे के साथ-साथ आय कर में भी अच्छी बचत कर सकते हैं। म्यूचुअल फंड योजनाएँ कई तरह की होती हैं।
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अब्राहम अलापट्ट, ब्रांड प्रमुख, फ्यूचर जनराली इंडिया लाइफ इन्श्योरेंस :
वित्तीय वर्ष का अंत करीब आते ही काफी निवेशक आय कर में बचत के लिहाज से निवेश के विकल्पों पर नजर डालते हैं और उनमें से बहुत लोग जीवन बीमा का विकल्प चुनते हैं। जीवन बीमा योजना खरीदना एक अच्छा और समझदारी भरा वित्तीय फैसला है और लंबी अवधि का ऐसा उत्पाद चुनने में कोई बुराई नहीं है, जिससे आपको आय कर में भी कुछ छूट मिल जाती हो। लेकिन समस्या तब आती है, जब कोई व्यक्ति लंबी अवधि के फायदों और परिणामों को देखे बिना केवल इस साल कर बचत के नजरिये से एक बीमा पॉलिसी खरीद लेता है।
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सतकाम दिव्य, बिजनेस हेड, रूपीटॉप डॉट कॉम :
इस समय हर आदमी कर (टैक्स) बचत के लिहाज से अलग-अलग योजनाओं में निवेश के बारे में सोच रहा है। आय कर अधिनियम की धारा 80 सी और 10 (10)डी के तहत निवेश के कई आकर्षक विकल्प हैं। वहीं 80 सी और 80 सीसीसी के तहत जीवन बीमा प्रीमियम, ईपीएफ, पीपीएफ, एनएसी, यूलिप, होम लोन, ईएलएसएस, एलआईसी और अन्य बीमा कंपनियों की पेंशन योजनाएँ लोकप्रिय कर बचत विकल्पों में शामिल हैं।
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रैनबैक्सी लेबोरेटरीज लिमिटेड के अपने नतीजे घोषित कर दिए हैं। कंपनी को अक्टूबर-दिसंबर 2011 तिमाही में 2983 करोड़ रुपये का कंसोलिडेटेड घाटा हुआ है। पिछले वर्ष 2010 की इसी तिमाही में कंपनी को 97.5 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। हालाँकि कंपनी की कुल आमदनी में बढ़ोतरी हुई है।
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राजीव रंजन झा :
अगर आपकी इजाजत हो तो सबसे पहले जरा अपनी पीठ थपथपा लूँ! ‘करीब 5200 तक उछाल की दिखती है गुंजाइश’ - यह शीर्षक था जनवरी 2012 के निवेश मंथन में राग बाजारी का। इसे लिखा गया था दिसंबर के अंत में, जब निफ्टी ने 4531 के निचले स्तर को बस उसी समय छुआ था। तब बाजार में काफी गहरी गिरावट के अंदेशे थे और यह शीर्षक देते समय समूचे बाजार की सोच से उल्टा कुछ लिखने में एक डर भी लग रहा था। लेकिन इस डर को पीछे हटा कर मैंने लिखा था, ‘यहाँ दो संभावनाएँ बनती हैं।
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आम तौर पर लोगों को लगता है कि बाजार या तो तेजी में होता है या मंदी में, लेकिन अभी मुझे दोनों में से कोई भी स्थिति नहीं लग रही है। लोग यह सोच कर चलते हैं कि अगर तेजी का बाजार (बुल मार्केट) है तो कोई भी 10 रुपये का शेयर लेकर बैठ जायें और कुछ समय में अपने-आप 20-30 का हो जायेगा। वहीं मंदी वाले बाजार (बीयर मार्केट) में लोग यह सोच कर चलते हैं कि जो भी बिकवाली (शॉर्ट) कर देंगे उसमें फायदा मिल जायेगा, या फिर हाथ में अच्छे-अच्छे जो शेयर हैं उन्हें भी बेच कर एकदम निकल जाना है। मेरा मानना है कि अभी बाजार में थोड़ी नरमी भले ही आ जाये, लेकिन ज्यादा बड़ी गिरावट नहीं होगी।
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ललित ठक्कर, एमडी, एंजेल ब्रोकिंग :
बजट में मेरे हिसाब से इस साल देखने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि खनन और भूमि अधिग्रहण विधेयक पर किस तरह के कदम उठाये जाते हैं। अब प्रधानमंत्री कार्यालय में इस बारे में कुछ सकारात्मक चर्चा होती दिख रही है और इस पर उठ रहे मुद्दों को सुलझाने के लिए उद्योग समूहों से बातचीत हुई है।
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संजय सिन्हा, संस्थापक, साइट्रस एडवाइजर्स :
बाजार की सबसे पहली अपेक्षा इस साल के केंद्रीय बजट से यह है कि इसमें सरकारी घाटे (फिस्कल डेफिसिट) पर नियंत्रण पाने की कोशिश की जायेगी। बाजार चाहता है कि सरकार अपने घाटे को काबू में लाये, साथ ही साथ उद्योग जगत यह भी उम्मीद कर रहा है कि सरकार करों की दरें इन स्तरों से अब ऊपर न बढ़ाये।
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गजेंद्र नागपाल, सीईओ, यूनिकॉन इन्वेस्टमेंट :
बाजार काफी समय से इस बात को लेकर चिंतित है कि सरकार की तरफ से नीतियों के मोर्चे पर कुछ नया नहीं हो रहा है और नीतिगत सुधार ठप पड़ा है। बाजार की चिंता यह है कि सरकार के इस तरह अटक जाने से अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है।
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शिवानी भास्कर :
बजट का समय आते ही बड़े-बड़े उद्योग घरानों से लेकर हर तरह के दबाव समूह से सक्रिय हो जाते हैं, चाहे वे किसानों से जुड़े हों, मजदूरों से या फिर नौकरीपेशा वर्ग से। उद्योग जगत के लिए मिनिमम अल्टरनेट टैक्स (मैट), उत्पाद (एक्साइज) शुल्क, अलग-अलग तरह के अन्य शुल्क और सेस वगैरह महत्वपूर्ण मसले होते हैं। शेयर बाजार का खास ध्यान लंबी अवधि और छोटी अवधि के पूँजीगत प्राप्ति कर (कैपिटल गेन टैक्स) और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) वगैरह पर होता है।
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